
गुरसरांय।होली परंपरा में भारतीय शास्त्रीय संगीत की होली गायन की परंपरा भी अपनी एक छाप छोड़ती है।
शास्त्रीय संगीत की होली गायन परंपरा शास्त्र सम्मत मानी गई है,जिसका गायन सम्पूर्ण भारत मे होता है।बुंदेलखंड में शास्त्रीय संगीत के साधक भी इस परंपरा का निर्वाह करते आ रहे है।
भारतीय शास्त्रीय संगीत में धमार एवं ध्रुपद गायन में राग काफी में दीपचन्दी ताल में गाये जाने वाली परंपरा बिलुप्त के कगार पर है।इसके बाबजूद भी जो पुराने गुरुकुल पद्धति के गुरु अपनी साधना से इस परंपरा का बखूबी निर्वाह कर रहे है।
मैहर घराने के प्रसिद्ध संगीतगुरु पं परशुराम पाठक ने बताया कि वह अपने ग्राम खड़ौरा के पास खेरी के परसोकर हनुमानजी पर विगत 61 वर्षों से शास्त्रीय संगीत की होली की परंपरा का निर्वाह करते आ रहे है।हनुमानजी की कृपा से जिन्होंने संगीत की साधना की है,वह अपनी हाजिरी देने यहां होली की परमा को पहुंच जाते है।उन्होंने बताया कि ग्राम खड़ौरा में जब वह बेसिक शिक्षा परिषद में अध्यापक थे तो वह विद्यार्थियों को लेकर यहां होली गायन करने आते थे,उसी परंपरा में जो शिष्य वहां से निकले सभी आज भी आते है।उन्होंने कहा कि जिनको उन्होंने निशुल्क शास्त्रीय संगीत की शिक्षा दी,वह सभी राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कर रहे,लेकिन इस परंपरा में अपनी हाजिरी जरूर देते हैं।
प्रख्यात सितार वादक पं सरजू शरण पाठक,शास्त्रीय गायक एवं राष्ट्रीय भागवताचार्य पं ब्रजेश त्रिपाठी तबला वादक अखिलेश त्रिपाठी, पखावज वादक गौरीशंकर सिरबैया,आकाशवाणी कलाकार बनमाली वर्मा,चंद्रभान सिंह परमार,बांसुरी वादक भगवत नारायण समाधिया आदि कलाकारों की वर्षों से प्रस्तुति हो रही है।
वरिष्ठ कलाकार अयोध्या प्रसाद त्रिपाठी ने बताया कि वह इस कार्यक्रम में प्रारम्भ से ही आ रहे है।
खेरी, गुढ़ा, खड़ौरा एवं मथनियाँ के प्रधान भी इस कार्यक्रम को भव्यता देने के लिए सहयोग करते है।
मा शारदा संगीत विद्यालय के तत्वावधान में 62 वा होली मिलन एवं फागोत्सव का कार्यक्रम खेरी के परसोकर हनुमानजी मंदिर पर 3 मार्च को दिन के 1 बजे से होगा, जिसमें आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के प्रख्यात गायक एवं वादक भाग लेंगे।
शास्त्रीय संगीत पद्धति का होली मिलन का बुंदेलखंड का यह पारंपरिक कार्यक्रम वर्षों से चला आ रहा है।
उक्त जानकारी कार्यक्रम के आयोजन संगीतगुरु पं परशुराम पाठक ने दी।





